माता शैलपुत्री की कथा

नवरात्री के पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है । माता दुर्गा के इस रूप में देवी का वाहन बैल या वृषभ है, इसलिए उनका एक नाम वृषोरूढ़ा भी है। माता के दाहिनी हाथ में त्रिशूल बाएं हाथ में कमल का फूल रहता है। माता शैलपुत्री को सती, उमा, पार्वती, हेमवती और भवानी के अन्य नामों से भी जाना जाता हैं।

माता शैलपुत्री का जन्म शैल या पत्थर से हुआ है इसलिए इनकी पूजा से जीवन में स्थिरता आती है। माता शैलपुत्री की विधिवत आराधना से वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है और घर में खुशहाली आती है। इनकी अर्चना से मूलाधार चक्र जागृत होते हैं जो अत्यन्त शुभ होता है। साथ ही नवरात्र के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा से चन्द्रमा से जुड़े सभी प्रकार के दोष दूर हो जाते हैं और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

माता शैलपुत्री का मंत्र

वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥

माता शैलपुत्री की कथा

माता शैलपुत्री का जन्म कैसे हुआ? इसकी एक बहुत ही रोचक कथा है।
प्रजापति दक्ष की ८० कन्यायें थीं। दक्ष की ही एक पुत्री सती भी थीं। इनका विवाह भगवान शिव से हुआ था । एक बार जब सती के पिता प्रजापति दक्ष ने यज्ञ किया तो इसमें सारे देवताओं को निमंत्रित किया, पर भगवान शंकर को नहीं।

दक्ष शिव जी को पसंद नहीं करते थें लेकिन सती अपने पिता के यज्ञ में जाने के लिए विकल हो उठीं। शंकरजी ने उन्हें समझाने की चेष्टा की। कहा कि सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में वहां जाना उचित नहीं है। परन्तु सती संतुष्ट नही हुईं।

सती का इच्छा देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती जब पिता के घर पहुंचीं तो सिर्फ उनकी मां ने ही उन्हें स्नेह दिया। सती की बहनों ने भी उपेक्षा दिखाई। उनके व्यवहार में भगवान शंकर के प्रति भी तिरस्कार का भाव था। दक्ष ने भी उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को बहुत क्लेश पहुंचा। वे अपने पति का यह अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपने आप को जलाकर भस्म कर लिया।

यही सती अगले जन्म में हिमालय की पुत्री बनकर शैलपुत्री के रूप में जन्मीं। इन्होने दुबारा भगवान् शिव से विवाह करने के लिए घोर तप किया। इस कारण दुबारा इनका विवाह भगवान् शिव से हुआ। इन्हें पार्वती के नाम से भी जाना जाता है।

Mata Shailputri
Mata Shailputri

नवरात्र के पहले दिन सौभाग्य की देवी, शैलपुत्री की सच्चे मन से करें। स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें, घर के मंदिर में साफ चौकी पर माता शैलपुत्री की फोटो रखें और कलश स्थापित करें। कलश के ऊपर पान के पत्ते, नारियल और स्वास्तिक भी बनाएं। मां शैलपुत्री को माला चढ़ाकर पास में ही दीये जलाएं। मां शैलपुत्री को सफेद फूल बहुत पसंद हैं इसलिए सफ़ेद फूल से पूजा करे। मां शैलपुत्री की कथा सुनें। कथा के समाप्त होने के बाद में अंत में आरती उतारें। आरती के बाद देवी को सफेद मिठाई का भोग लगाकर प्रसाद बांटें और रात में भी मां की फोटो के पास कपूर जलाएं।

माता शैलपुत्री की पूजा में सफ़ेद पुष्प एवं सफ़ेद मिठाई का भोग बहुत ही महत्वपूर्ण है।

माता शैलपुत्री की आरती

शैलपुत्री मां बैल असवार। करें देवता जय जयकार।
शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी।

पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।
ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।

सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी।
उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो।

घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के।
श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।

जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।
मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।

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