कैसे हुआ माता दुर्गा का जन्म?

एक बार दैत्यराज महिषासुर ने देवताओं को भगा कर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। वह बड़ा ही शक्तिशाली था। उसे वरदान प्राप्त था की उसकी मृत्यु कुंवारी कन्या के हाथ से ही होग। इसी कारण देवगण उससे पराजित हो गए थें।

तब सभी देवता मिलकर त्रिमूर्ती के पास गए। तब ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने, दैत्यराज महिषासुर के वध के लिए, अपने शरीर की ऊर्जा से एक आकृति बनाई। इस देवी की छवि बेहद सौम्य और आकर्षक थी और उनके कई हाथ थे। त्रिदेवों ने और सभी देवताओं ने अपनी शक्तियां उस आकृति में डाली। इसीलिए माँ दुर्गा को शक्ति भी कहा जाता है।

विभिन्न देवताओं की देह से निकले हुए तेज से ही देवी के अलग-अलग अंग बने। भगवान शंकर के तेज से देवी का मुख प्रकट हुआ, यमराज के तेज से मस्तक और बाल, विष्णु के तेज से भुजाएं, चंद्रमा के तेज से स्तन, इंद्र के तेज से कमर, वरुण के तेज से जंघा, पृथ्वी के तेज से नितंब, ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य के तेज से दोनों पैरों की ऊंगलियां, प्रजापति के तेज से सारे दांत, अग्नि के तेज से दोनों नेत्र, संध्या के तेज से भौंहें, वायु के तेज से कान तथा अन्य देवताओं के तेज से देवी के भिन्न-भिन्न अंग बने।

फिर शिवजी ने उस महाशक्ति को अपना त्रिशूल दिया, लक्ष्मी जी ने कमल का फूल, विष्णु ने चक्र, अग्नि ने शक्ति व बाणों से भरे तरकश, प्रजापति ने स्फटिक मणियों की माला, वरुण ने दिव्य शंख, हनुमान जी ने गदा, शेषनाग ने मणियों से सुशोभित नाग, इंद्र ने वज्र, भगवान राम ने धनुष, वरुण देव ने पाश व तीर, ब्रह्मा ने चारों वेद तथा हिमालय पर्वत ने सवारी के लिए शेर प्रदान किया।

इसके अतिरिक्त समुद्र ने बहुत उज्जवल हार, कभी न फटने वाले दिव्य वस्त्र, चूड़ामणि, दो कुंडल, हाथों के कंगन, पैरों के नूपुर तथा अंगुठियां भेंट कीं। इन सब वस्तुओं को देवी ने अपनी अठारह भुजाओं में धारण किया।

Mahishasura Mardini Goddess Durga

मां दुर्गा इस सृष्टि की आद्य शक्ति हैं यानी आदि शक्ति हैं। पितामह ब्रह्माजी, भगवान विष्णु और भगवान शंकर उन्हीं की शक्ति से सृष्टि की उत्पत्ति, पालन-पोषण और संहार करते हैं। अन्य देवता भी उन्हीं की शक्ति से शक्तिमान होकर सारे कार्य करते हैं। मां के इस तेज को देखकर दैत्यराज बहुत डर गया। भयंकर युद्ध के बाद देवी ने अपने शेर और शस्‍त्रों से मार उसे डाला। राक्षस महिषासुर का वध करने के कारण ही माता को महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है।

ऋग्वेद के दसवें मण्डल, दसवें अध्याय एवं एक सौ पच्चीसवें सूत्र में वर्णित “देवी सूक्त” में माँ दुर्गा की महिमा एवं शक्ति का वर्णन किया गया है।

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