॥ श्री रामचरितमानस ॥

जनकजी का पहुँचना, कोल किरातादि की भेंट, सबका परस्पर मिलाप
॥ श्री रामचरितमानस ॥

जनकजी का पहुँचना, कोल किरातादि की भेंट, सबका परस्पर मिलाप

दोहा : प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु। सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु॥274॥ उस समय सब

वनवासियों द्वारा भरतजी की मंडली का सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप
॥ श्री रामचरितमानस ॥

वनवासियों द्वारा भरतजी की मंडली का सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप

दोहा : सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग। बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग॥249॥ तालाबों में कमल खिल

भरतजी का मन्दाकिनी स्नान, चित्रकूट में पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिता का शोक और श्राद्ध
॥ श्री रामचरितमानस ॥

भरतजी का मन्दाकिनी स्नान, चित्रकूट में पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिता का शोक और श्राद्ध

लखन राम सियँ सुनि सुर बानी। अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी॥ इहाँ भरतु सब सहित सहाए। मंदाकिनीं पुनीत नहाए॥2॥

श्री रामजी का लक्ष्मणजी को समझाना एवं भरतजी की महिमा कहना
॥ श्री रामचरितमानस ॥

श्री रामजी का लक्ष्मणजी को समझाना एवं भरतजी की महिमा कहना

सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीयँ सादर सनमाने॥ कही तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई॥3॥ देववाणी

श्री सीताजी का स्वप्न, श्री रामजी को कोल-किरातों द्वारा भरतजी के आगमन की सूचना, रामजी का शोक, लक्ष्मणजी का क्रोध
॥ श्री रामचरितमानस ॥

श्री सीताजी का स्वप्न, श्री रामजी को कोल-किरातों द्वारा भरतजी के आगमन की सूचना, रामजी का शोक, लक्ष्मणजी का क्रोध

उहाँ रामु रजनी अवसेषा। जागे सीयँ सपन अस देखा॥ सहित समाज भरत जनु आए। नाथ बियोग ताप तन ताए॥2॥ उधर

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