इंद्र-बृहस्पति संवाद
देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू॥ गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न […]
देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू॥ गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न […]
दोहा : करि प्रबोधु मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु। कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु॥212॥ इस प्रकार
दोहा : भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग। कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग॥203॥ प्रेम में उमँग-उमँगकर
दोहा : करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ। मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेमु न हृदयँ समाइ॥193॥ दण्डवत
चौपाई : सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने॥ समाचार सब सुने निषादा। हृदयँ बिचार करइ सबिषादा॥1॥ रात भर
दोहा : जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृद मातु पितु भाइ। सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ॥185॥
दोहा : तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु। उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु॥169॥ (वशिष्ठजी
दोहा : मलिन बसन बिबरन बिकल कृस शरीर दुख भार। कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार॥163॥ कौसल्याजी मैले
हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी॥ आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि॥1॥ बाजार
दोहा : तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास। सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास॥156॥ तब वशिष्ठ मुनि