॥ श्री रामचरितमानस ॥

भरतजी का प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज संवाद
॥ श्री रामचरितमानस ॥

भरतजी का प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज संवाद

दोहा : भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग। कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग॥203॥ प्रेम में उमँग-उमँगकर

भरत-निषाद मिलन और संवाद और भरतजी का तथा नगरवासियों का प्रेम
॥ श्री रामचरितमानस ॥

भरत-निषाद मिलन और संवाद और भरतजी का तथा नगरवासियों का प्रेम

दोहा : करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ। मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेमु न हृदयँ समाइ॥193॥ दण्डवत

वशिष्ठ-भरत संवाद, श्री रामजी को लाने के लिए चित्रकूट जाने की तैयारी
॥ श्री रामचरितमानस ॥

वशिष्ठ-भरत संवाद, श्री रामजी को लाने के लिए चित्रकूट जाने की तैयारी

दोहा : तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु। उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु॥169॥ (वशिष्ठजी

भरत-कौसल्या संवाद और दशरथजी की अन्त्येष्टि क्रिया
॥ श्री रामचरितमानस ॥

भरत-कौसल्या संवाद और दशरथजी की अन्त्येष्टि क्रिया

दोहा : मलिन बसन बिबरन बिकल कृस शरीर दुख भार। कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार॥163॥ कौसल्याजी मैले

श्री भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक
॥ श्री रामचरितमानस ॥

श्री भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक

हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी॥ आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि॥1॥ बाजार

मुनि वशिष्ठ का भरतजी को बुलाने के लिए दूत भेजना
॥ श्री रामचरितमानस ॥

मुनि वशिष्ठ का भरतजी को बुलाने के लिए दूत भेजना

दोहा : तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास। सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास॥156॥ तब वशिष्ठ मुनि

Scroll to Top