रामायणजी की आरती
आरती श्रीरामायणजी की। कीरति कलित ललित सिय पी की।। गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद। बालमीक बिग्यान बिसारद।। सुक सनकादि सेष अरु […]
आरती श्रीरामायणजी की। कीरति कलित ललित सिय पी की।। गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद। बालमीक बिग्यान बिसारद।। सुक सनकादि सेष अरु […]
पूँछिहु राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि॥ सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा॥3॥ जो
चौपाई : रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥ एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि
चौपाई : पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ॥। नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न मम कहहु
भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप। मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप॥114 ख॥ मैं हठ करके भक्ति
दोहा : गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग। रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग॥110 क॥
दोहा : सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि बिप्र अनुरागु। पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु॥108 क॥ सर्वज्ञ शिवजी ने
करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि। बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि॥107 ख॥ प्रेम सहित दण्डवत्
सोरठा : गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम। मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई॥105 ख॥ गुरुजी
चौपाई : सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई।। जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ