श्री राम-लक्ष्मण सहित विश्वामित्र का जनकपुर में प्रवेश
चौपाई :: चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा॥ गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि […]
चौपाई :: चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा॥ गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि […]
आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं॥ पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा
दोहा : आयुध सर्ब समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि। कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि॥209॥ सब अस्त्र-शस्त्र
दोहा : ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप। भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप॥205॥ जो व्यापक, अकल
दोहा : जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल। चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल॥190॥ योग, लग्न, ग्रह,
गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी॥ यह सब रुचिर चरित मैं भाषा। अब सो
दोहा : जानि सभय सुर भूमि सुनि बचन समेत सनेह। गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक संदेह॥186॥ देवताओं और पृथ्वी को
चौपाई :: बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा॥ मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥1॥
दोहा : भरद्वाज सुनु जाहि जब होई बिधाता बाम। धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम॥175॥ (याज्ञवल्क्यजी कहते हैं-) हे
चौपाई :: सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति संभु बखानी॥ बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ