मनु-शतरूपा तप एवं वरदान
दोहा : सो मैं तुम्ह सन कहउँ सबु सुनु मुनीस मन लाइ। रामकथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ॥141॥ हे […]
दोहा : सो मैं तुम्ह सन कहउँ सबु सुनु मुनीस मन लाइ। रामकथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ॥141॥ हे […]
दोहा : आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि। कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि॥130॥ (फिर) राजा ने राजकुमारी
सोरठा : सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल। कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरुड़॥120 ख॥ हे पार्वती! निर्मल रामचरितमानस
दोहा : जटा मुकुट सुरसरित सिर लोचन नलिन बिसाल। नीलकंठ लावन्यनिधि सोह बालबिधु भाल॥106॥ उनके सिर पर जटाओं का मुकुट
दोहा : मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि। कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि॥100॥ मुनियों की आज्ञा
दोहा : लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान। होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान॥91॥ सब देवता अपने भाँति-भाँति
दोहा : सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु। निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु॥88॥ हे शंकर! सब
दोहा : अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु। बिनु बपु ब्यापिहि सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु॥87॥
दोहा : अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु। जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु॥76॥ (फिर
दोहा : सुरन्ह कही निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार। संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार॥83॥