॥ श्री रामचरितमानस ॥

श्री-रामगुण-और-श्री-रामचरित्‌-की-महिमा
॥ श्री रामचरितमानस ॥

श्री रामगुण और श्री रामचरित्‌ की महिमा

मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥ राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो। निज दिसि देखि दयानिधि पोसो॥2॥ वे […]

॥ श्री रामचरितमानस ॥

वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, देवता, शिव, पार्वती आदि की वंदना

सोरठा : बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ। सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित॥14 घ॥ मैं उन वाल्मीकि

तुलसीदासजी की दीनता और राम भक्तिमयी कविता की महिमा
॥ श्री रामचरितमानस ॥

तुलसीदासजी की दीनता और राम भक्तिमयी कविता की महिमा

जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू॥ निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब

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