॥ श्री रामचरितमानस ॥

सप्तर्षियों की परीक्षा में पार्वतीजी का महत्व
॥ श्री रामचरितमानस ॥

सप्तर्षियों की परीक्षा में पार्वतीजी का महत्व

चौपाई : रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी॥ बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी॥1॥ ऋषियों

पति के अपमान से दुःखी होकर सती का योगाग्नि से जल जाना, दक्ष यज्ञ विध्वंस
॥ श्री रामचरितमानस ॥

पति के अपमान से दुःखी होकर सती का योगाग्नि से जल जाना, दक्ष यज्ञ विध्वंस

दोहा : सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध। सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध॥63॥ परन्तु

शिवजी द्वारा सती का त्याग
॥ श्री रामचरितमानस ॥

शिवजी द्वारा सती का त्याग, शिवजी की समाधि

परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु। प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु॥56॥ सती परम पवित्र

सती का भ्रम, श्री रामजी का ऐश्वर्य और सती का खेद
॥ श्री रामचरितमानस ॥

सती का भ्रम, श्री रामजी का ऐश्वर्य और सती का खेद

रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना॥ ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी॥4॥ श्री रामजी की

नारद का अभिमान और माया का प्रभाव
॥ श्री रामचरितमानस ॥

नारद का अभिमान और माया का प्रभाव

दोहा : संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान। भरद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान॥127॥ यद्यपि शिवजी ने यह हित

याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद तथा प्रयाग माहात्म्य
॥ श्री रामचरितमानस ॥

याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद तथा प्रयाग माहात्म्य

अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद। कहउँ जुगल मुनिबर्य कर मिलन सुभग संबाद ॥43 ख॥ मैं अब श्री

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