पार्वती का जन्म और तपस्या
सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा॥ तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई॥3॥ […]
सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा॥ तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई॥3॥ […]
चौपाई : रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी॥ बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी॥1॥ ऋषियों
दोहा : सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध। सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध॥63॥ परन्तु
दोहा : दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग। नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग॥60॥ दक्ष
परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु। प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु॥56॥ सती परम पवित्र
रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना॥ ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी॥4॥ श्री रामजी की
दोहा : संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान। भरद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान॥127॥ यद्यपि शिवजी ने यह हित
अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद। कहउँ जुगल मुनिबर्य कर मिलन सुभग संबाद ॥43 ख॥ मैं अब श्री
दोहा : जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु। अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु॥35॥ यह
सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन गाथा॥ संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा॥2॥