॥ श्री रामचरितमानस ॥

अंगदजी का लंका जाना और रावण की सभा में अंगद-रावण संवाद
॥ श्री रामचरितमानस ॥

अंगदजी का लंका जाना और रावण की सभा में अंगद-रावण संवाद

चौपाई : इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई॥ कहहु बेगि का करिअ उपाई। जामवंत कह पद सिरु […]

मन्दोदरी का फिर रावण को समझाना और श्री राम की महिमा कहना
॥ श्री रामचरितमानस ॥

मन्दोदरी का फिर रावण को समझाना और श्री राम की महिमा कहना

सयन करहु निज निज गृह जाईं। गवने भवन सकल सिर नाई॥ मंदोदरी सोच उर बसेऊ। जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ॥3॥

श्री रामजी के बाण से रावण के मुकुट-छत्रादि का गिरना
॥ श्री रामचरितमानस ॥

श्री रामजी के बाण से रावण के मुकुट-छत्रादि का गिरना

पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान। दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान॥12 ख॥ पवनपुत्र हनुमान्‌जी के वचन

subel par shree raamajee kee jhaankee - lanka kaand
॥ श्री रामचरितमानस ॥

सुबेल पर श्री रामजी की झाँकी और चंद्रोदय वर्णन

चौपाई : इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा॥ सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुभ्र

रावण को मन्दोदरी का समझाना, रावण-प्रहस्त संवाद
॥ श्री रामचरितमानस ॥

रावण को मन्दोदरी का समझाना, रावण-प्रहस्त संवाद

दोहा : बाँध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस। सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस॥5॥ वननिधि, नीरनिधि, जलधि, सिंधु, वारीश, तोयनिधि,

श्री रामजी का सेना सहित समुद्र पार उतरना, सुबेल पर्वत पर निवास, रावण की व्याकुलता
॥ श्री रामचरितमानस ॥

श्री रामजी का सेना सहित समुद्र पार उतरना, सुबेल पर्वत पर निवास, रावण की व्याकुलता

दोहा : सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं। अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं॥4॥ सेतुबन्ध पर बड़ी

नल-नील द्वारा पुल बाँधना, श्री रामजी द्वारा श्री रामेश्वर की स्थापना
॥ श्री रामचरितमानस ॥

नल-नील द्वारा पुल बाँधना, श्री रामजी द्वारा श्री रामेश्वर की स्थापना

सोरठा : सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ। अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उतरै कटकु॥ समुद्र

मंगलाचरण
॥ श्री रामचरितमानस ॥

मंगलाचरण

षष्ठ सोपान- मंगलाचरण श्लोक : रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्‌। मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं

समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध और समुद्र की विनती, श्री राम गुणगान की महिमा
॥ श्री रामचरितमानस ॥

समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध और समुद्र की विनती, श्री राम गुणगान की महिमा

दोहा : बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥57॥

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