कुम्भकर्ण युद्ध और उसकी परमगति
चौपाई : बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन॥ नाथ भूधराकार सरीरा। कुंभकरन आवत रनधीरा॥1॥॥ भाई के वचन […]
चौपाई : बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन॥ नाथ भूधराकार सरीरा। कुंभकरन आवत रनधीरा॥1॥॥ भाई के वचन […]
चौपाई : यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ। अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ॥ ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि
चौपाई : उहाँ राम लछिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी॥ अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर
दोहा : देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि। बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि॥58॥ भरतजी ने आकाश
जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना॥ धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता॥4॥ जाम्बवान् ने
कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध। सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध॥48 ख॥ जो कालस्वरूप हैं, दुष्टों के समूह
दोहा : कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ। गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ॥47॥ कुछ मारे गए,
दोहा : जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव। गर्जहिं सिंहनाद कपि भालु महा बल सींव॥39॥ महान् बल की सीमा
इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सिरु नावा॥ अति आदर समीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी॥2॥ यहाँ (सुबेल पर्वत
साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ। मंदोदरीं रावनहिं बहुरि कहा समुझाइ॥35 ख॥ सन्ध्या हो गई जानकर दशग्रीव बिलखता हुआ (उदास