॥ श्री रामचरितमानस ॥

सुमन्त्र का अयोध्या को लौटना और सर्वत्र शोक देखना
॥ श्री रामचरितमानस ॥

सुमन्त्र का अयोध्या को लौटना और सर्वत्र शोक देखना

दोहा : भयउ निषादु बिषादबस देखत सचिव तुरंग। बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग॥143॥ मंत्री और घोड़ों की यह

चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों के द्वारा सेवा
॥ श्री रामचरितमानस ॥

चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों के द्वारा सेवा

दोहा : चित्रकूट महिमा अमित कही महामुनि गाइ। आइ नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ॥132॥ महामुनि वाल्मीकिजी ने चित्रकूट

यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम
॥ श्री रामचरितमानस ॥

यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम

दोहा : तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।। राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेइँ कीन्ह॥111॥ तब श्री रामचन्द्रजी

प्रयाग पहुँचना, भरद्वाज संवाद, यमुनातीर निवासियों का प्रेम
॥ श्री रामचरितमानस ॥

प्रयाग पहुँचना, भरद्वाज संवाद, यमुनातीर निवासियों का प्रेम

दोहा : तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ। सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ॥104॥ तब प्रभु

लक्ष्मण-निषाद संवाद, श्री राम-सीता से सुमन्त्र का संवाद, सुमंत्र का लौटना
॥ श्री रामचरितमानस ॥

लक्ष्मण-निषाद संवाद, श्री राम-सीता से सुमन्त्र का संवाद, सुमंत्र का लौटना

बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी॥ काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम

श्री राम का श्रृंगवेरपुर पहुँचना, निषाद के द्वारा सेवा
॥ श्री रामचरितमानस ॥

श्री राम का श्रृंगवेरपुर पहुँचना, निषाद के द्वारा सेवा

दोहा : सुद्ध सच्चिदानंदमय कंद भानुकुल केतु। चरितकरत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु॥87॥ शुद्ध (प्रकृतिजन्य त्रिगुणों से रहित, मायातीत दिव्य

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