श्री राम-सीता-लक्ष्मण का वन गमन और नगर निवासियों को सोए छोड़कर आगे बढ़ना
दोहा : सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत। बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत॥79॥ वन […]
दोहा : सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत। बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत॥79॥ वन […]
सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे॥ सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी॥4॥ ‘श्री
हरषित हृदयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए॥ जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा॥2॥ वे
चौपाई : समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए॥ कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम
कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई॥ बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई॥3॥
चौपाई : मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं॥ राजकुमारि सिखावनु सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू॥1॥
अति बिषाद बस लोग लोगाईं। गए मातु पहिं रामु गोसाईं॥ मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ॥4॥
दोहा : गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह। सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह॥43॥ इतने में
करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ॥ तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी॥2॥ श्री
छन्द : केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई। मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई॥ दोउ बासना रसना