॥ श्री रामचरितमानस ॥

मंगलाचरण
॥ श्री रामचरितमानस ॥

मंगलाचरण

सप्तम सोपान श्लोक : केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्‌। पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं। नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम्‌॥1।

पुष्पक विमान पर चढ़कर श्री सीता-रामजी का अवध के लिए प्रस्थान, श्री रामचरित्र की महिमा
॥ श्री रामचरितमानस ॥

पुष्पक विमान पर चढ़कर श्री सीता-रामजी का अवध के लिए प्रस्थान, श्री रामचरित्र की महिमा

दोहा : प्रभु प्रेरित कपि भालु सब राम रूप उर राखि। हरष बिषाद सहित चले बिनय बिबिध बिधि भाषि॥118 क॥

विभीषण का वस्त्राभूषण बरसाना और वानर-भालुओं का उन्हें पहनना
॥ श्री रामचरितमानस ॥

विभीषण का वस्त्राभूषण बरसाना और वानर-भालुओं का उन्हें पहनना

बहुरि विभीषन भवन सिधायो। मनि गन बसन बिमान भरायो॥ लै पुष्पक प्रभु आगें राखा। हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा॥2॥ फिर

विभीषण की प्रार्थना, श्री रामजी के द्वारा भरतजी की प्रेमदशा का वर्णन, शीघ्र अयोध्या पहुँचने का अनुरोध
॥ श्री रामचरितमानस ॥

विभीषण की प्रार्थना, श्री रामजी के द्वारा भरतजी की प्रेमदशा का वर्णन, शीघ्र अयोध्या पहुँचने का अनुरोध

चौपाई : करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए॥ नाइ चरन सिरु कह मृदु बानी। बिनय सुनहु

देवताओं की स्तुति, इंद्र की अमृत वर्षा
॥ श्री रामचरितमानस ॥

देवताओं की स्तुति, इंद्र की अमृत वर्षा

दोहा : बरषहिं सुमन हरषि सुर बाजहिं गगन निसान। गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ीं बिमान॥109 क॥ देवता हर्षित होकर फूल

हनुमान्‌जी का सीताजी को कुशल सुनाना, सीताजी का आगमन और अग्नि परीक्षा
॥ श्री रामचरितमानस ॥

हनुमान्‌जी का सीताजी को कुशल सुनाना, सीताजी का आगमन और अग्नि परीक्षा

चौपाई : पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना। लंका जाहु कहेउ भगवाना॥ समाचार जानकिहि सुनावहु। तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु॥1॥

मन्दोदरी-विलाप, रावण की अन्त्येष्टि क्रिया
॥ श्री रामचरितमानस ॥

मन्दोदरी-विलाप, रावण की अन्त्येष्टि क्रिया

चौपाई : पति सिर देखत मंदोदरी। मुरुछित बिकल धरनि खसि परी॥ जुबति बृंद रोवत उठि धाईं। तेहि उठाइ रावन पहिं

रावण का मूर्च्छा टूटना, राम-रावण युद्ध, रावण वध, सर्वत्र जयध्वनि
॥ श्री रामचरितमानस ॥

रावण का मूर्च्छा टूटना, राम-रावण युद्ध, रावण वध, सर्वत्र जयध्वनि

इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा। निज सारथि सन खीझन लागा। सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही। धिग धिग अधम मंदमति तोही॥4॥ यहाँ आधी

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